नेपाल की बाढ़ ने फिर जगाई हिमालय में GLOF के खतरे की चिंता

the threat of GLOF in the Himalayas: नेपाल के हिमालयी इलाकों में हालिया बाढ़ और चीन-नेपाल सीमा के पास हुई प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हिमालयी राज्यों में ग्लेशियर और हिमस्खलन से जुड़े खतरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में आपदा से निपटने की तैयारियों की समीक्षा तेज कर दी है। गुरुवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन जैसे संभावित खतरों पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक में संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के अधिकारियों के साथ गृह मंत्रालय, NDMA, केंद्रीय जल आयोग, मौसम विभाग और DGRE के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। अधिकारियों ने खास तौर पर उन ग्लेशियल झीलों और बर्फीले इलाकों की निगरानी बढ़ाने पर जोर दिया, जहां अचानक बाढ़ या हिमस्खलन का खतरा अधिक है। इसके साथ ही संवेदनशील इलाकों की पहचान, शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने, स्थानीय स्तर तक अलर्ट पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की तैयारियों की समीक्षा की गई।

नेपाल में 26 अगस्त को भोटे कोशी नदी में अचानक बढ़े जलप्रवाह ने इस खतरे की गंभीरता को सामने ला दिया। नेपाल-चीन सीमा के पास ऊपरी क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के खिसकने से नदी के प्रवाह में अस्थायी रुकावट बनी और उसके बाद पानी तेजी से नीचे की ओर आया। इस घटना से हिमालयी घाटियों में बड़े पैमाने पर तबाही हुई। नेपाल के अधिकारियों के मुताबिक, आपदा में 1,100 से अधिक लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने की सूचना है। इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में खतरे की सूचना लोगों तक कितनी जल्दी पहुंचाई जा सकती है।

केंद्र ने राज्यों से कहा है कि आपदा प्रबंधन को केवल घटना के बाद राहत और बचाव तक सीमित न रखा जाए, बल्कि पहले से जोखिम कम करने पर ध्यान दिया जाए। गृह सचिव ने 2024 में मंजूर GLOF शमन परियोजनाओं में तेजी लाने और राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन तथा वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। राज्यों से अपने आपदा प्रबंधन प्लान की नियमित समीक्षा करने, चेतावनी और निकासी व्यवस्था की कमियों को दूर करने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में जरूरी संसाधन पहले से उपलब्ध रखने को कहा गया है। बैठक में इस बात पर भी जोर रहा कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्राकृतिक खतरे के बाद प्रतिक्रिया देने का समय बेहद कम होता है, इसलिए मजबूत निगरानी और समय पर चेतावनी ही बड़े नुकसान को रोकने में सबसे अहम भूमिका निभा सकती है।

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