Could melting glaciers increase the risk of earthquakes? ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में glacier तेजी से पिघल रहे हैं। इसका असर सिर्फ समुद्र के बढ़ते जलस्तर और पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अब इसके भूगर्भीय प्रभावों को भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। हालिया शोधों में संकेत मिले हैं कि बर्फ और ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर पिघलने से पृथ्वी की ऊपरी परत पर पड़ने वाला दबाव बदल सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधियों को प्रभावित करने की संभावना रहती है। हालांकि, वैज्ञानिक इसे भूकंप आने का सीधा कारण नहीं मानते।
दरअसल, बड़े glacier और बर्फ की चादरें अपने नीचे की धरती पर भारी दबाव डालती हैं। जब लंबे समय तक जमा यह बर्फ पिघलती है तो उस भार में कमी आती है। इसे वैज्ञानिक Glacial Isostatic Adjustment (GIA) कहते हैं। इस प्रक्रिया में पृथ्वी की पपड़ी धीरे-धीरे अपना संतुलन बदलती है और इससे चट्टानों तथा फॉल्ट पर तनाव में बदलाव हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह पहले से तनावग्रस्त फॉल्ट को सक्रिय होने के करीब ला सकता है।
क्या glacier पिघलने से सीधे आता है भूकंप?
इस सवाल का जवाब फिलहाल पूरी तरह ‘हां’ नहीं है। भूकंप का सबसे बड़ा कारण पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल है। खासकर हिमालय जैसे क्षेत्रों में भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की लगातार टक्कर के कारण धरती के भीतर भारी तनाव जमा होता है। ऐसे में ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले दबाव परिवर्तन को एक अतिरिक्त कारक के तौर पर देखा जा सकता है, न कि भूकंप का अकेला कारण।
2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में फ्रांस-इटली सीमा के पास Grandes Jorasses क्षेत्र में करीब 15 वर्षों की भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बर्फ और glacier के पिघलाव तथा स्थानीय भूकंपीय गतिविधि के बीच संबंध के संकेत पाए। शोध को इस दिशा में प्रत्यक्ष अवलोकन का महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया है, हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे संबंधों को समझने के लिए अभी और अध्ययन जरूरी हैं।
हिमालय के लिए क्यों अहम है यह सवाल?
हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में शामिल है और यहां ग्लेशियर भी तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहे हैं। हालिया अध्ययनों में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके चलते glacier झीलों के विस्तार, अचानक बाढ़, भूस्खलन और पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता जैसे खतरे भी बढ़ रहे हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय प्रक्रियाओं के बीच संबंध बेहद जटिल है। glacier का पिघलना किसी बड़े भूकंप की भविष्यवाणी का आधार नहीं बन सकता। लेकिन बर्फ के भार में बदलाव, पानी का जमीन के भीतर जाना और चट्टानों पर तनाव में परिवर्तन जैसी प्रक्रियाएं स्थानीय स्तर पर भूकंपीय गतिविधि को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए विशेषज्ञों के लिए चुनौती अब सिर्फ ग्लेशियरों के पीछे हटने की निगरानी करना नहीं, बल्कि उन इलाकों में भूकंप, भूस्खलन, glacier झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ जैसे खतरों को एक साथ समझना भी है। खासकर हिमालयी राज्यों में बेहतर भूकंपीय निगरानी और ग्लेशियर मॉनिटरिंग आने वाले समय में आपदा जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
