नस्लीय भेदभाव पर UN की रिपोर्ट को भारत ने किया खारिज, MEA ने रिपोर्ट पर उठाए सवाल

India rejects UN report on racial discrimination; MEA raises questions about the report: भारत ने नस्लीय भेदभाव के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की कमेटी ऑन द एलिमिनेशन ऑफ रेशियल डिस्क्रिमिनेशन (CERD) की हालिया टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने समिति के कुछ निष्कर्षों को “राजनीति से प्रेरित” और “बेहद दुर्भावनापूर्ण” बताते हुए कहा कि रिपोर्ट में किए गए कुछ दावे जमीनी तथ्यों से मेल नहीं खाते।

दरअसल, CERD ने भारत के साथ फिनलैंड, होंडुरास और कुवैत की भी समीक्षा की थी। भारत पर अपनी टिप्पणियों में समिति ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दलितों और रोहिंग्या शरणार्थियों समेत कुछ अन्य समुदायों के साथ कथित भेदभाव को लेकर चिंता जताई। समिति ने ऐसे मामलों की त्वरित, निष्पक्ष और प्रभावी जांच तथा दोषियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत बताई।

भारत ने गिनाईं संवैधानिक सुरक्षा व्यवस्थाएं

UN समिति की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत समीक्षा प्रक्रिया में रचनात्मक और सकारात्मक भावना के साथ शामिल हुआ था। मंत्रालय ने दोहराया कि देश नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है।

समीक्षा के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने देश के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनी ढांचे, न्यायिक व्यवस्था और वंचित वर्गों के लिए लागू विभिन्न कल्याणकारी नीतियों का उल्लेख किया। सरकार का कहना है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य समाज के कमजोर और हाशिए पर मौजूद वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना है।

भारत की ओर से समीक्षा में प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारतीय पक्ष ने बैठक के दौरान ही व्यापक सामान्यीकरण, बिना पर्याप्त आधार वाले आरोपों और कन्वेंशन के दायरे से बाहर की टिप्पणियों पर आपत्ति दर्ज कराई थी।

MEA ने कहा कि भारत निर्धारित प्रक्रिया के तहत समिति की टिप्पणियों का जवाब देगा। हालांकि, मंत्रालय ने रिपोर्ट में मौजूद उन संदर्भों को लेकर कड़ा रुख अपनाया जिन्हें वह राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण मानता है।

UN समिति ने क्या कहा?

CERD संयुक्त राष्ट्र की एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति है, जो यह देखती है कि सदस्य देश नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन को किस तरह लागू कर रहे हैं।

भारत की हालिया समीक्षा 11 और 12 अगस्त को जिनेवा में हुई। इसमें 2023 में भारत की ओर से प्रस्तुत आवधिक रिपोर्टों पर चर्चा की गई। समीक्षा के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था, कानूनों के क्रियान्वयन, हाशिए पर मौजूद समुदायों की स्थिति और भेदभाव व असहिष्णुता से निपटने के लिए उठाए गए कदमों पर सवाल-जवाब हुए।

समिति ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों से जुड़े कथित उल्लंघनों और जातीय, जातीय-धार्मिक तथा आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर भी चिंता जताई।

भारत ने बताया अपनी विविधता का ढांचा

जिनेवा स्थित भारत के स्थायी मिशन के अनुसार, भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने देश की बहुलतावादी और विविध सामाजिक संरचना, संवैधानिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक जवाबदेही, न्यायिक उपायों और लक्षित सरकारी नीतियों को प्रमुखता से सामने रखा।

भारत ने यह भी बताया कि सामाजिक और आर्थिक विकास के साथ-साथ सरकार समानता, सम्मान और अवसर सुनिश्चित करने के लिए लगातार नीतिगत कदम उठा रही है।

भारत का कहना है कि वह लंबे समय से वैश्विक मानवाधिकार व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है। 1960 के दशक में भी भारत ने उपनिवेशवाद, रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई थी और ICERD के निर्माण तथा बातचीत की प्रक्रिया में भाग लिया था।

फिलहाल, CERD की टिप्पणियों और भारत की कड़ी प्रतिक्रिया ने एक बार फिर मानवाधिकार, सामाजिक समानता और अंतरराष्ट्रीय निगरानी को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है।

Srishti
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