Increasing pressure of Gen Z in Uttarakhand: उत्तराखंड में पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं को एक साथ देखें तो शिक्षा व्यवस्था को लेकर असंतोष की तस्वीर साफ दिखाई देती है। यह सिर्फ युवाओं के गुस्से की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें स्कूल की छात्राओं से लेकर विश्वविद्यालय के छात्र और दृष्टिबाधित दिव्यांग विद्यार्थी तक अपनी-अपनी समस्याओं के साथ आवाज उठा रहे हैं। किसी जगह शिक्षक नहीं हैं, कहीं परीक्षा परिणाम समय पर नहीं आ रहे और कहीं छात्रवृत्ति, ब्रेल शिक्षकों, हॉस्टल और जरूरी सुविधाओं की मांग को लेकर विद्यार्थी आंदोलन कर रहे हैं। यानी सवाल अलग-अलग हैं, लेकिन चिंता एक ही है—क्या शिक्षा व्यवस्था छात्रों को वह सुविधा और अवसर दे पा रही है, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है?
देहरादून से बेतालघाट तक उठी आवाज
देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तीकरण संस्थान (NIEPVD) के मॉडल स्कूल फॉर विजुअल डिसएबिलिटीज में दृष्टिबाधित विद्यार्थियों का आंदोलन इसी बड़े सवाल की एक तस्वीर है। छात्रों ने मेरिट और संस्थागत छात्रवृत्ति बहाल करने, वादे के मुताबिक लैपटॉप देने, हॉस्टल और कैफेटेरिया की व्यवस्था सुधारने, स्थायी प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और प्राथमिक कक्षाओं में ब्रेल शिक्षकों की कमी दूर करने जैसी मांगें उठाईं। अंग्रेजी माध्यम की किताबें समय पर उपलब्ध कराने के साथ मोबिलिटी इंस्ट्रक्टर, महिला फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर, मेडिकल स्टाफ और हॉस्टल वार्डन जैसी सुविधाओं की मांग भी सामने आई। सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि ये वे विद्यार्थी हैं जिनके लिए ब्रेल शिक्षा, मोबिलिटी ट्रेनिंग और सहायक सुविधाएं किसी अतिरिक्त सुविधा से ज्यादा, पढ़ाई और आत्मनिर्भरता की बुनियादी जरूरत हैं। आंदोलन संस्थान की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद समाप्त हुआ।
इसी तरह नैनीताल के बेतालघाट स्थित राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की छात्राओं ने शिक्षकों के रिक्त पदों को लेकर प्रदर्शन किया। दसवीं से बारहवीं तक की कक्षाओं में पढ़ने वाली छात्राओं के लिए शिक्षक की कमी सिर्फ खाली पीरियड का मामला नहीं है। इसका असर बोर्ड परीक्षा की तैयारी से लेकर आगे की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं तक पड़ सकता है। पहाड़ के सरकारी स्कूलों में पहले से ही संसाधनों की सीमाएं हैं, ऐसे में विषयवार शिक्षक उपलब्ध नहीं होना विद्यार्थियों के सामने एक और चुनौती खड़ी करता है। छात्राओं का सड़क पर उतरना इस बात का संकेत भी है कि अब विद्यार्थी अपनी समस्याओं को सिर्फ स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखना चाहते।
रिजल्ट में देरी ने बढ़ाई छात्रों की बेचैनी
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कॉलेजों में छात्रों का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था के एक दूसरे पहलू को सामने लाता है। देहरादून और हरिद्वार के विभिन्न आयुर्वेद कॉलेजों के छात्र परीक्षा समय पर कराने और लंबित परीक्षा परिणाम जारी करने समेत 10 सूत्री मांगों को लेकर आंदोलन पर उतरे। प्रदर्शन के दौरान चार छात्रों के पानी की टंकी पर चढ़ने से मामला और गंभीर हो गया। बाद में सरकार के मंत्री से बातचीत के बाद छात्रों ने अपना प्रदर्शन समाप्त किया। छात्रों की नाराजगी इसलिए समझी जा सकती है क्योंकि प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में परीक्षा और रिजल्ट में देरी का असर केवल एक सेमेस्टर तक सीमित नहीं रहता। आगे की पढ़ाई, इंटर्नशिप, प्रवेश और करियर की पूरी समय-सारिणी इससे प्रभावित हो सकती है। अगस्त में भी छात्र इसी तरह की समस्याओं को लेकर आंदोलन कर चुके थे और सितंबर की शुरुआत में एक बार फिर उनका गुस्सा सामने आया।
अलग-अलग मांगें, लेकिन सवाल एक
बेतालघाट की छात्राओं के लिए शिक्षक जरूरी हैं, आयुर्वेद छात्रों के लिए समय पर रिजल्ट और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए ब्रेल शिक्षक, छात्रवृत्ति और जरूरी सुविधाएं। मांगें अलग-अलग हैं, लेकिन इन सभी के केंद्र में शिक्षा के अधिकार और बेहतर भविष्य की चिंता है।
