उत्तराखंड की ऑर्गेनिक चाय का बढ़ता कारोबार,1600 हेक्टेयर में बागान और 4200 लोगों को रोजगार

plantations spanning 1600 hectares and employment for 4,200 people: उत्तराखंड में चाय की खेती अब सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रह गई है। सरकार चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ इसे रोजगार, ग्रामीण आर्थिकी और पर्यटन से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही है। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के गठन के बाद प्रदेश में चाय की खेती को 1600 हेक्टेयर में बागान के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं।

टी बोर्ड के अनुसार, प्रदेश में चाय उत्पादन से करीब 4200 लोगों को रोजगार मिला है। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है। चाय बागानों में काम मिलने से ग्रामीण महिलाओं को अपने गांव और आसपास ही रोजगार मिल रहा है, जिससे परिवार की आय बढ़ाने में मदद मिल रही है। इसके साथ ही रोजगार के लिए पहाड़ से होने वाले पलायन को रोकने की उम्मीद भी बढ़ी है।

चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए टी बोर्ड ने करीब 3800 काश्तकारों की भूमि लीज पर लेकर 1600 हेक्टेयर क्षेत्र में चाय बागान विकसित किए हैं। प्रदेश में अब पांच चाय फैक्ट्रियां भी स्थापित हो चुकी हैं। यहां सालभर में करीब 9 लाख किलो हरी चाय की पत्तियों का चुगान होता है, जिसमें लगभग 2 लाख किलो ऑर्गेनिक चाय का उत्पादन किया जाता है और इससे करीब 4 करोड़ रुपये की आय अर्जित हो रही है। अब सरकार चाय बागानों को पर्यटन से जोड़ने की तैयारी में भी जुटी है। टी टूरिज्म के जरिए पर्यटकों को पहाड़ों की हरियाली और चाय बागानों की खूबसूरती देखने के साथ चाय तैयार होने की प्रक्रिया को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।

करीब 190 साल पुराना है चाय का सफर

उत्तराखंड में चाय की खेती का इतिहास करीब 190 साल पुराना है। वर्ष 1835 में कुमाऊं क्षेत्र में चाय की खेती की शुरुआत हुई थी। इसके बाद वर्ष 1850 तक कुमाऊं में 40 से अधिक चाय बागान विकसित हो चुके थे। हालांकि वर्ष 1900 के बाद यहां चाय उत्पादन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया और लगभग बंद हो गया।

आजादी के बाद वर्ष 1994 में पर्वतीय जिलों में चाय उत्पादन को दोबारा बढ़ावा देने की पहल शुरू हुई और उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2004 में उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड का गठन किया गया। टी बोर्ड के उपनिदेशक अनिल खोलिया के मुताबिक, आने वाले समय में चाय बागानों के विस्तार के साथ बेहतर बाजार, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर भी जोर दिया जा रहा है। चाय उत्पादन उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार और ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने के साथ पलायन रोकने में भी अहम भूमिका निभा सकती है।

Aarti Rawat
Aarti Rawat